🪷 Rāmcharitamānas · Laṅkā-Kāṇḍa · Entry 265

The Book of Laṅkā (the Yuddha) · Entry 265 of 273 · type: दोहा/सोरठा

तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात। भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात।।116(क)।। तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि। देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि।।116(ख)।। बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर। सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर।।116(ग)।। करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं। पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं।।116(घ)।।
— Rāmcharitamānas Laṅkā-Kāṇḍa entry 265 (दोहा/सोरठा) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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