🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 677

The Book of Childhood · Entry 677 of 760 · type: छंद

आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं। सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं।। मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं। भरे कनक कोपर कलस सो सब लिएहिं परिचारक रहैं।।1।। कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो।। सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेम काहु न लखि परै।। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै।।2।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 677 (छंद) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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