🪷 Rāmcharitamānas · Araṇya-Kāṇḍa · Entry 63

The Book of the Forest · Entry 63 of 98 · type: चौपाई

हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।। आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक।। हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा।। बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।। बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।। सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।। गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।। अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।। सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।। धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।। रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही।। आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।। की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।। जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा।। सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।। तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।। राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा।। उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।। धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।। चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही।। तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।। काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।। सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।। करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।। गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी।। एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ।।
— Rāmcharitamānas Araṇya-Kāṇḍa entry 63 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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