🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 267

The Book of the Aftermath · Entry 267 of 270 · type: चौपाई

मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।। तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई।। यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि।। कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।। द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।। राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी।। गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई।। ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 267 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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