🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 244

The Book of the Aftermath · Entry 244 of 270 · type: चौपाई

सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।। ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।। सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।। जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।। तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।। श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।। जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।। अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई।। सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।। जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।। तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।। नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।। परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई।। तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।। मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी।। तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 244 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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