🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 228
The Book of the Aftermath · Entry 228 of 270 · type: चौपाई
एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।।
बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी।।
जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा।।
तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी।।
छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी।।
मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि।।
जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई।।
कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।।
रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ।।
पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें।।
सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।।
अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना।।
इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला।।
जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई।।
अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।
औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 228 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī
Place in the Mānas
- Entry 228 of 270 in Uttara-Kāṇḍa (Kāṇḍa 7 of 7)
- Verse type: चौपाई
- Kāṇḍa theme: Rāmarājya · ⭐ Bhuśuṇḍi-Garuḍa saṁvāda (the supreme jñāna-bhakti dialogue) · the seven questions and seven answers · the highest Tulsidās bhakti-vedanta · Rāma's final teachings · pari-praśna closes the Mānas
Navigation
🪷 जय श्री राम · जय गोस्वामी तुलसीदास 🪷