🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 217

The Book of the Aftermath · Entry 217 of 270 · type: चौपाई

नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।। सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।। सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।। बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस।। तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।। बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।। काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही।। नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 217 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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