🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 213

The Book of the Aftermath · Entry 213 of 270 · type: छंद

अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।। सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता।।1।। नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।। लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।। कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा। नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता।।3।। इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता।। सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए।।4।। दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी।। तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे।।5।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 213 (छंद) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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