🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 168

The Book of the Aftermath · Entry 168 of 270 · type: चौपाई

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।। मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं।। उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया।। अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका।। कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा।। अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला।। सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा।। सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 168 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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