🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 154

The Book of the Aftermath · Entry 154 of 270 · type: चौपाई

असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।। जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी।। नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई।। जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा।। नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा।। बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी।। हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा।। मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी।। ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 154 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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