🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 152

The Book of the Aftermath · Entry 152 of 270 · type: चौपाई

जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा।। सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा।। सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूपो बल धामा।। ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता।। अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता।। निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा।। प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।। इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 152 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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