🪷 Rāmcharitamānas · Laṅkā-Kāṇḍa · Entry 252

The Book of Laṅkā (the Yuddha) · Entry 252 of 273 · type: चौपाई

तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई।। आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी।। दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया।। बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारगगामी।। तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी।। अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय।। मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी।। जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो।। यह खल मलिन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही।। अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरे मन बिसमय आवा।। हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी।। भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे।।
— Rāmcharitamānas Laṅkā-Kāṇḍa entry 252 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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