🪷 Rāmcharitamānas · Laṅkā-Kāṇḍa · Entry 247

The Book of Laṅkā (the Yuddha) · Entry 247 of 273 · type: चौपाई

अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता।। तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई।। सुनि संदेसु भानुकुलभूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन।। मारुतसुत के संग सिधावहु। सादर जनकसुतहि लै आवहु।। तुरतहिं सकल गए जहँ सीता। सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता।। बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो। तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो।। बहु प्रकार भूषन पहिराए। सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए।। ता पर हरषि चढ़ी बैदेही। सुमिरि राम सुखधाम सनेही।। बेतपानि रच्छक चहुँ पासा। चले सकल मन परम हुलासा।। देखन भालु कीस सब आए। रच्छक कोपि निवारन धाए।। कह रघुबीर कहा मम मानहु। सीतहि सखा पयादें आनहु।। देखहुँ कपि जननी की नाईं। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाई।। सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे।। सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी।।
— Rāmcharitamānas Laṅkā-Kāṇḍa entry 247 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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