🪷 Rāmcharitamānas · Laṅkā-Kāṇḍa · Entry 233

The Book of Laṅkā (the Yuddha) · Entry 233 of 273 · type: चौपाई

सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा।। लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा।। धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा।। गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी।। डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर।। धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई।। मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा।। प्रबिसे सब निषंग महु जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई।। तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन।। जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा।। बरषहि सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा।।
— Rāmcharitamānas Laṅkā-Kāṇḍa entry 233 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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