🪷 Rāmcharitamānas · Laṅkā-Kāṇḍa · Entry 156

The Book of Laṅkā (the Yuddha) · Entry 156 of 273 · type: चौपाई

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा।। कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा।। तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई।। लै त्रिसुल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे।। आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा।। कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए।। प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा।। उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा।। फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा।। आवत देखि क्रुद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला।। देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना।। बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई।। देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा।। लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा।। सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा।। छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा।।
— Rāmcharitamānas Laṅkā-Kāṇḍa entry 156 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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