🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 682

The Book of Childhood · Entry 682 of 760 · type: चौपाई

कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं।।नयन लाभु सब सादर लेहीं।। जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी।। राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं । मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा।। दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी।। भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे।। प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरी। नेगसहित सब रीति निबेरीं।। राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं।। अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें।। बहुरि बसिष्ठ दीन्ह अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 682 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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