🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 537

The Book of Childhood · Entry 537 of 760 · type: चौपाई

नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।। अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी।। सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई।। कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा।। बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा।। सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी।। निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी।। अति परिताप सीय मन माही। लव निमेष जुग सब सय जाहीं।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 537 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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