🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 456

The Book of Childhood · Entry 456 of 760 · type: चौपाई

लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।। प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं।। राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हिंयँ हुलसानी।। परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई।। नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं।। जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौ।। सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती।। धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 456 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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