🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 412

The Book of Childhood · Entry 412 of 760 · type: चौपाई

यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिन मनि चले करत गुनगाना।। देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा।। औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी।। काक भुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ।। परमानंद प्रेमसुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले।। यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई।। तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा।। गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 412 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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