🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 639

The Book of Ayodhyā · Entry 639 of 664 · type: चौपाई

भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।। भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।। गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।। सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।। भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।। करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।। मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।। अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 639 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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