🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 610

The Book of Ayodhyā · Entry 610 of 664 · type: चौपाई

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।। कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।। तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए।। देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।। को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी।। निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें।। सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।। पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 610 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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