🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 602

The Book of Ayodhyā · Entry 602 of 664 · type: चौपाई

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।। फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया।। बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।। मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।। बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी।। सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।। भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू।। अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 602 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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