🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 592

The Book of Ayodhyā · Entry 592 of 664 · type: चौपाई

राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।। राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।। गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।। नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।। सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू।। उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा।। अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।। तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 592 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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