🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 580

The Book of Ayodhyā · Entry 580 of 664 · type: चौपाई

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।। रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन।। तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी।। गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।। लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।। नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।। सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।। देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 580 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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