🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 551

The Book of Ayodhyā · Entry 551 of 664 · type: चौपाई

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।। असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी।। चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची।। जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए।। करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे।। दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता।। सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा।। बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 551 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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