🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 549

The Book of Ayodhyā · Entry 549 of 664 · type: चौपाई

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।। जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई।। देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।। कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।। उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।। अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।। अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।। प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 549 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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