🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 362

The Book of Ayodhyā · Entry 362 of 664 · type: चौपाई

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।। मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा।। गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।। उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू।। तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।। जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।। अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।। ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 362 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

Place in the Mānas

Navigation

🪷 जय श्री राम · जय गोस्वामी तुलसीदास 🪷