🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 80

The Book of the Aftermath · Entry 80 of 270 · type: चौपाई

सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए।। पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं।। सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी।। अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना।। जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता।। नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं।। तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।। सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 80 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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