🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 68

The Book of the Aftermath · Entry 68 of 270 · type: चौपाई

जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।। भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि।। जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि।। धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि।। काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि।। लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि।। संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि।। जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि।। बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि।। मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 68 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

Place in the Mānas

Navigation

🪷 जय श्री राम · जय गोस्वामी तुलसीदास 🪷