🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 55

The Book of the Aftermath · Entry 55 of 270 · type: चौपाई

सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।। प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।। राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती।। हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा।। अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं।। दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।। दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर।। दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 55 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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