🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 53

The Book of the Aftermath · Entry 53 of 270 · type: चौपाई

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।। श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर।। पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता।। जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई।। जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी।। निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई।। जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ।। कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं।। उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 53 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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