🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 51

The Book of the Aftermath · Entry 51 of 270 · type: चौपाई

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन।। खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।। कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।। सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गूंजत अलि लै चलि मकरंदा।। लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं।। ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी।। प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी।। सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी।। सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।। सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 51 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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