🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 5

The Book of the Aftermath · Entry 5 of 270 · type: चौपाई

देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।। मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।। जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती।। रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।। रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।। सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।। को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए।। मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।। दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर।। मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता।। कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।। बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता।। एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।। नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।। तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा।। कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 5 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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