🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 33

The Book of the Aftermath · Entry 33 of 270 · type: छंद

जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।। अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।। दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।। रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।। महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।। मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।। मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।। हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।। बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।। भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।। अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।। अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।। नहिं राग न लोभ न मान मदा।।तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।। एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।। करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।। सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।। मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।। तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।। गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।। रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 33 (छंद) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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