🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 3

The Book of the Aftermath · Entry 3 of 270 · type: चौपाई

रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।। कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।। अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।। कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।। जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।। जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।। मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई।। बीतें अवधि रहहि जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 3 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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