🪷 Rāmcharitamānas · Uttara-Kāṇḍa · Entry 234

The Book of the Aftermath · Entry 234 of 270 · type: चौपाई

कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।। परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।। बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें।। काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।। भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक।। राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें।। पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई।। लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।। हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई।। अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना।। एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।। पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।। मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि।। सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही।। सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।। लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।
— Rāmcharitamānas Uttara-Kāṇḍa entry 234 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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