🪷 Rāmcharitamānas · Laṅkā-Kāṇḍa · Entry 37

The Book of Laṅkā (the Yuddha) · Entry 37 of 273 · type: चौपाई

बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।। प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका।। पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भैंटा।। बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई।। तेहि अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई।। निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी।। एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं।। भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहीं जारी।। अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा।। बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई।।
— Rāmcharitamānas Laṅkā-Kāṇḍa entry 37 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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