🪷 Rāmcharitamānas · Laṅkā-Kāṇḍa · Entry 201

The Book of Laṅkā (the Yuddha) · Entry 201 of 273 · type: चौपाई

चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा।। रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका।। तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना।। बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के।। तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा।। तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैंचि सरासन छाँड़े सायक।। रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी।। दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे।। स्त्रवत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना।। तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे।। काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने।। प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए।। पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा।। रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू। मानहुँ अमित केतु अरु राहू।।
— Rāmcharitamānas Laṅkā-Kāṇḍa entry 201 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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