🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 60

The Book of Childhood · Entry 60 of 760 · type: चौपाई

अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी।। समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें।। सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही।। कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की।। रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की।। जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली।। सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी।। ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 60 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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