🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 42

The Book of Childhood · Entry 42 of 760 · type: चौपाई

आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।। सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू।। कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के।। बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती।। नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता।। भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन । स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के।। जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 42 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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