🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 286

The Book of Childhood · Entry 286 of 760 · type: चौपाई

जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई।। तहँ बैठ महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ।। करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई।। रीझहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी।। मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।। जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी।। काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा।। मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 286 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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