🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 205

The Book of Childhood · Entry 205 of 760 · type: चौपाई

नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा।। अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लगि तपु कीन्हा।। साचेहुँ उन्ह के मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया।। पर घर घालक लाज न भीरा। बाझँ कि जान प्रसव कैं पीरा।। जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी।। अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता।। करम लिखा जौ बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू।। तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 205 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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