🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 15

The Book of Childhood · Entry 15 of 760 · type: चौपाई

अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता।। काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई।। सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं।। खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू।। लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ।। उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।। किएहुँ कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू।। हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू।। गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा।। साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी।। धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई।। सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 15 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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