🪷 Rāmcharitamānas · Bāla-Kāṇḍa · Entry 115

The Book of Childhood · Entry 115 of 760 · type: चौपाई

सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ।। कछु न परीछा लीन्हि गोसाई। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाई।। जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई।। तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना।। बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा।। हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना।। सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा।। जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती।।
— Rāmcharitamānas Bāla-Kāṇḍa entry 115 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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