🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 60

The Book of Ayodhyā · Entry 60 of 664 · type: चौपाई

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।। मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।। तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।। सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।। गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।। बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू।। माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन।। मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला।। अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 60 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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