🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 47

The Book of Ayodhyā · Entry 47 of 664 · type: चौपाई

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।। तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।। जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली।। बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई।। बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी।। पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।। कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।। राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 47 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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