🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 262

The Book of Ayodhyā · Entry 262 of 664 · type: चौपाई

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।। बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।। सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।। जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।। भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।। लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।। निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।। तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 262 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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