🪷 Rāmcharitamānas · Ayodhyā-Kāṇḍa · Entry 125

The Book of Ayodhyā · Entry 125 of 664 · type: चौपाई

मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।। राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू।। आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू।। आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।। एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा।। जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।। तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी।। कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही।।
— Rāmcharitamānas Ayodhyā-Kāṇḍa entry 125 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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