🪷 ŚB 11.7.18
Sanskrit, transliteration, word meanings, and translation for steady Bhāgavata reading.
Sanskrit
Transliteration
Synonyms
Translation
Therefore, O Lord, feeling weary of material life and tormented by its distresses, I now surrender unto You because You are the perfect master. You are the unlimited, all-knowing Supreme Personality of Godhead, whose spiritual abode in Vaikuṇṭha is free from all disturbances. In fact, You are known as Nārāyaṇa, the true friend of all living beings.
गीता प्रेस, गोरखपुर · पृथक पाठ-साक्षी
Sanskrit and Hindi Witness
इस पाठ-साक्षी का श्लोक-पता वर्तमान ŚB मार्ग से ठीक मिलता है। गीता प्रेस और वर्तमान अंग्रेज़ी पाठ को मिलाया नहीं गया है; दोनों अपने-अपने स्रोत-रूप में साथ पढ़े जा सकते हैं।
ŚB 11.7.18 · गीता प्रेस पाठ
हिन्दी टीका-पाठ
उद्धवजीने कहा— भगवन्! आप ही समस्त योगियोंकी गुप्त पूँजी योगोंके कारण और योगेश्वर हैं। आप ही समस्त योगोंके आधार, उनके कारण और योगस्वरूप भी हैं। आपने मेरे परम-कल्याणके लिये उस संन्यासरूप त्यागका उपदेश किया है॥ १४॥ परन्तु अनन्त! जो लोग विषयोंके चिन्तन और सेवनमें घुल-मिल गये हैं, विषयात्मा हो गये हैं, उनके लिये विषय-भोगों और कामनाओंका त्याग अत्यन्त कठिन है। सर्वस्वरूप! उनमें भी जो लोग आपसे विमुख हैं, उनके लिये तो इस प्रकारका त्याग सर्वथा असम्भव ही है ऐसा मेरा निश्चय है॥ १५॥ प्रभो! मैं भी ऐसा ही हूँ; मेरी मति इतनी मूढ़ हो गयी है कि ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है’ इस भावसे मैं आपकी मायाके खेल, देह और देहके सम्बन्धी स्त्री, पुत्र, धन आदिमें डूब रहा हूँ। अत: भगवन्! आपने जिस संन्यासका उपदेश किया है, उसका तत्त्व मुझ सेवकको इस प्रकार समझाइये कि मैं सुगमतापूर्वक उसका साधन कर सकूँ॥ १६॥ मेरे प्रभो! आप भूत, भविष्य, वर्तमान इन तीनों कालोंसे अबाधित, एकरस सत्य हैं। आप दूसरेके द्वारा प्रकाशित नहीं, स्वयंप्रकाश आत्मस्वरूप हैं। प्रभो! मैं समझता हूँ कि मेरे लिये आत्मतत्त्वका उपदेश करनेवाला आपके अतिरिक्त देवताओंमें भी कोई नहीं है। ब्रह्मा आदि जितने बड़े-बड़े देवता हैं, वे सब शरीराभिमानी होनेके कारण आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं। उनकी बुद्धि मायाके वशमें हो गयी है। यही कारण है कि वे इन्द्रियोंसे अनुभव किये जानेवाले बाह्य विषयोंको सत्य मानते हैं। इसीलिये मुझे तो आप ही उपदेश कीजिये॥ १७॥ भगवन्! इसीसे चारों ओरसे दु:खोंकी दावाग्निसे जलकर और विरक्त होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप निर्दोष देश-कालसे अपरिच्छिन्न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और अविनाशी वैकुण्ठलोकके निवासी एवं नरके नित्य सखा नारायण हैं। (अत: आप ही मुझे उपदेश कीजिये)॥ १८॥
स्रोत-खंड सीमा · यह हिन्दी अंश गीता प्रेस डिजिटल पाठ में इस दृश्य श्लोक-इकाई के बाद आता है; इसे स्वतः एक-से-एक टीका या संस्करण-समानता नहीं माना गया है।
Source witness details
Sanskrit SHA-256:
7685bbafc971ea9d153d3e3c74c2ba4af3650e7fc50cca6c06b453ee80f02e5fHindi SHA-256:
19b0026190b0f7a9a4177e7c7ca50d81c6294c8c04aacd9fd57b1e0be1b8a9beAddress crosswalk: exact · final textual equivalence: not claimed
Sources and Connected Bhāgavata Readings
After the Sanskrit, word meanings, translation, and reading navigation, these links connect the requested reference with its canonical received passage, parent chapter and skandha, and the wider Bhāgavata corpus without inventing artificial verse boundaries.
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