🪷 ŚB 11.28.35
Sanskrit, transliteration, word meanings, and translation for steady Bhāgavata reading.
Sanskrit
Transliteration
Synonyms
Translation
The Supreme Lord is self-luminous, unborn and immeasurable. He is pure transcendental consciousness and perceives everything. One without a second, He is realized only after ordinary words cease. By Him the power of speech and the life airs are set into motion.
गीता प्रेस, गोरखपुर · पृथक पाठ-साक्षी
Sanskrit and Hindi Witness
इस पाठ-साक्षी का श्लोक-पता वर्तमान ŚB मार्ग से ठीक मिलता है। गीता प्रेस और वर्तमान अंग्रेज़ी पाठ को मिलाया नहीं गया है; दोनों अपने-अपने स्रोत-रूप में साथ पढ़े जा सकते हैं।
ŚB 11.28.35 · गीता प्रेस पाठ
हिन्दी टीका-पाठ
जो अपने स्वरूपमें स्थित हो गया है, उसे इस बातका भी पता नहीं रहता कि शरीर खड़ा है या बैठा, चल रहा है या सो रहा है, मल-मूत्र त्याग रहा है, भोजन कर रहा है अथवा और कोई स्वाभाविक कर्म कर रहा है; क्योंकि उसकी वृत्ति तो आत्मस्वरूपमें स्थित—ब्रह्माकार रहती है॥ ३१॥ यदि ज्ञानी पुरुषकी दृष्टिमें इन्द्रियोंके विविध बाह्य विषय, जो कि असत् हैं, आते भी हैं तो वह उन्हें अपने आत्मासे भिन्न नहीं मानता, क्योंकि वे युक्तियों, प्रमाणों और स्वानुभूतिसे सिद्ध नहीं होते। जैसे नींद टूट जानेपर स्वप्नमें देखे हुए और जागनेपर तिरोहित हुए पदार्थोंको कोई सत्य नहीं मानता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष भी अपनेसे भिन्न प्रतीयमान पदार्थोंको सत्य नहीं मानते॥ ३२॥ उद्धवजी! (इसका यह अर्थ नहीं है कि अज्ञानीने आत्माका त्याग कर दिया है और ज्ञानी उसको ग्रहण करता है। इसका तात्पर्य केवल इतना ही है कि) अनेकों प्रकारके गुण और कर्मोंसे युक्त देह, इन्द्रिय आदि पदार्थ पहले अज्ञानके कारण आत्मासे अभिन्न मान लिये गये थे, उनका विवेक नहीं था। अब आत्मदृष्टि होनेपर अज्ञान और उसके कार्योंकी निवृत्ति हो जाती है। इसलिये अज्ञानकी निवृत्ति ही अभीष्ट है। वृत्तियोंके द्वारा न तो आत्माका ग्रहण हो सकता है और न त्याग॥ ३३॥ जैसे सूर्य उदय होकर मनुष्योंके नेत्रोंके सामनेसे अन्धकारका परदा हटा देते हैं, किसी नयी वस्तुका निर्माण नहीं करते, वैसे ही मेरे स्वरूपका दृढ़ अपरोक्षज्ञान पुरुषके बुद्धिगत अज्ञानका आवरण नष्ट कर देता है। वह इदंरूपसे किसी वस्तुका अनुभव नहीं कराता॥ ३४॥ उद्धवजी! आत्मा नित्य अपरोक्ष है, उसकी प्राप्ति नहीं करनी पड़ती। वह स्वयंप्रकाश है। उसमें अज्ञान आदि किसी प्रकारके विकार नहीं हैं। वह जन्मरहित है अर्थात् कभी किसी प्रकार भी वृत्तिमें आरूढ़ नहीं होता। इसलिये अप्रमेय है। ज्ञान आदिके द्वारा उसका संस्कार भी नहीं किया जा सकता। आत्मामें देश, काल और वस्तुकृत परिच्छेद न होनेके कारण अस्तित्व, वृद्धि, परिवर्तन, ह्रस और विनाश उसका स्पर्श भी नहीं कर सकते। सबकी और सब प्रकारकी अनुभूतियाँ आत्मस्वरूप ही हैं। जब मन और वाणी आत्माको अपना अविषय समझकर निवृत्त हो जाते हैं, तब वही सजातीय, विजातीय और स्वगत भेदसे शून्य एक अद्वितीय रह जाता है। व्यवहारदृष्टिसे उसके स्वरूपका वाणी और प्राण आदिके प्रवर्तकके रूपमें निरूपण किया जाता है॥ ३५॥
स्रोत-खंड सीमा · यह हिन्दी अंश गीता प्रेस डिजिटल पाठ में इस दृश्य श्लोक-इकाई के बाद आता है; इसे स्वतः एक-से-एक टीका या संस्करण-समानता नहीं माना गया है।
Source witness details
Sanskrit SHA-256:
2c22e33913799484ad38ac64090938f36e0a7e79631707768f6af8a1d24ed48bHindi SHA-256:
27f2151c789bd67727fb85ea540f854ddeb1e4ff2fec9c4d09cd3157dbee0fdbAddress crosswalk: exact · final textual equivalence: not claimed
Sources and Connected Bhāgavata Readings
After the Sanskrit, word meanings, translation, and reading navigation, these links connect the requested reference with its canonical received passage, parent chapter and skandha, and the wider Bhāgavata corpus without inventing artificial verse boundaries.
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